पद्म श्री पुरस्कार प्राप्त
डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर
भारतीय शैलचित्र अध्ययन के अग्रदूत, भीमबेटका शैलाश्रयों के खोजकर्ता और एक दूरदर्शी पुरातत्वविद् जिनके कार्यों ने प्राचीन भारतीय सभ्यता की समझ को नया आयाम दिया।
जन्म
4 मई 1919
नीमच (मध्य प्रदेश)
क्षेत्र
पुरातत्व • शैल कला
पुरस्कार
पद्म श्री (1975)
प्रकाशन
6 पुस्तकें • 400+ शोध पत्र

शिक्षा
- प्रारंभिक शिक्षा – धार
- जीडी आर्ट – मुंबई
- बीए एवं एमए – विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन
- पीएचडी (इतिहास एवं पुरातत्व) – पुणे
स्थापित संस्थान
डॉ. वाकणकर ने उज्जैन में भारती कला भवन की स्थापना की, जो चित्रकला, मूर्तिकला एवं कला परंपराओं के अध्ययन के लिए समर्पित एक केंद्र है।
उन्होंने वाकणकर भारती संस्कृति अन्वेषण न्यास की भी स्थापना की, जो प्राचीन भारतीय इतिहास, पुरातत्व, मुद्राशास्त्र, अभिलेख एवं शैल कला के शोध हेतु समर्पित है।
जीवन एवं प्रमुख घटनाएँ
1919
डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर का जन्म नीमच, मध्य प्रदेश में हुआ।
1957
भोपाल के निकट ट्रेन यात्रा के दौरान भीमबेटका शैलाश्रयों की खोज — भारतीय शैल कला अनुसंधान में एक महत्वपूर्ण मोड़।
1975
पुरातत्व एवं सांस्कृतिक धरोहर में योगदान हेतु पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित।
1980s
प्राचीन सरस्वती नदी की खोज के लिए अभियानों का नेतृत्व तथा सिंधु–सरस्वती सभ्यता से संबंधित स्थलों का अध्ययन।
अनुसंधान एवं प्रकाशन
डॉ. वाकणकर ने राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में अनेक शोध पत्र प्रस्तुत किए और छह से अधिक पुस्तकें तथा 400 से अधिक शोध प्रकाशन किए।
उनकी व्यापक यात्राओं ने उन्हें विश्व के प्रमुख पुरातात्विक स्थलों एवं संग्रहालयों का अध्ययन करने और भारतीय सांस्कृतिक विरासत पर व्याख्यान देने का अवसर प्रदान किया।
मुख्य योगदान

भीमबेटका के चित्रित शैलाश्रय
भोपाल के निकट रातापानी वन्यजीव अभयारण्य में स्थित भीमबेटका शैलाश्रय 10,000 वर्ष से अधिक पुराने प्रागैतिहासिक चित्रों को समेटे हुए हैं।
डॉ. वाकणकर ने लगभग 750 शैलाश्रयों की खोज एवं दस्तावेजीकरण किया, जो विश्व के सबसे महत्वपूर्ण शैल कला समूहों में से एक है और आज यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल के रूप में मान्यता प्राप्त है।
प्राचीन सरस्वती नदी की खोज
उनका एक प्रमुख योगदान प्राचीन सरस्वती नदी की खोज भी था। उन्होंने ऐसे अभियानों का नेतृत्व किया जिनमें नदी के प्राचीन मार्ग के साथ हड़प्पा काल से जुड़े स्थलों की पहचान की गई।
उनके शोध ने इस विचार को मजबूत किया कि सिंधु क्षेत्र की सभ्यता को सिंधु–सरस्वती सभ्यता के रूप में समझा जाना चाहिए।


डोंगला मेरिडियन की खोज
उज्जैन के निकट डोंगला गाँव में उन्होंने एक ऐसा भौगोलिक बिंदु पहचाना जहाँ कर्क रेखा एक विशेष देशांतर को काटती है।
ग्रीष्म संक्रांति के समय सूर्य ठीक सिर के ऊपर होता है और कोई छाया नहीं बनती — यह एक महत्वपूर्ण खगोलीय घटना है।
विरासत
डॉ. वाकणकर ने अपनी खोजों और शोध के माध्यम से प्रागैतिहासिक शैल कला और प्राचीन भारतीय सभ्यता की वैश्विक समझ को बदल दिया। भीमबेटका पर उनके कार्य ने भारत को विश्व के पुरातत्व मानचित्र पर प्रमुख स्थान दिलाया और उन्हें 1975 में पद्म श्री पुरस्कार प्राप्त हुआ।
